Balan The Boy Review: जेल में जन्मा, पहचान बदलने को हुआ मजबूर… मां-बेटे के इस अनोखे रिश्ते ने फिल्म को बना दिया मास्टरपीस!
Film Review: कान्स फिल्म फेस्टिवल में अपना कमाल दिखाने के बाद मंजुम्मेल बॉयज' फेम डायरेक्टर चिदंबरम की नई फिल्म 'बालन: द बॉय' थिएटर्स में दस्तक दे चुकी है. ये सिर्फ एक इमोशनल ड्रामा नहीं, बल्कि मां-बेटे के रिश्ते की आड़ में छिपी एक बेहतरीन क्राइम स्टोरी और कैरेक्टर स्टडी है. अगर आप भी इस फिल्म को देखने का मन बना रहे हैं? तो इससे पहले ये रिव्यू जरूर पढ़ें.
Malayalam Movie Balan The Boy Review: साल 2024 में आई फिल्म ‘मंजुम्मेल बॉयज’ ने बॉक्स ऑफिस पर जो धूम मचाई थी. उस ब्लॉकबस्टर फिल्म के बाद हर कोई ये जानने के लिए उत्सुक था कि इसके टैलेंटेड डायरेक्टर चिदंबरम की अगली फिल्म कौन सी होगी? अंदाजा लगाया जा रहा था कि वो किसी बड़े सुपरस्टार के साथ कोई टिपिकल कमर्शियल मसाला फिल्म बनाएंगे. लेकिन चिदंबरम ने सबको चौंकाते हुए एक ऐसा रास्ता चुना, जिसने साबित कर दिया कि वह सिर्फ हिट फिल्में बनाने वाले मशीन नहीं, बल्कि सिनेमा की रूह को समझने वाले एक सच्चे जादूगर हैं. कान्स की सैर करने के बाद उनकी नई फिल्म ‘बालन: द बॉय’ थिएटर में आ चुकी है. फिल्म का जब पहला ट्रेलर आया था, तभी से ये साफ हो गया था कि ये एक मां और बेटे के रिश्ते की कहानी है, जो एक मोड़ पर आकर बड़ी चुनौती का सामना करती है. अगर सिर्फ एक लाइन में कहें, तो ‘बालन’ आपके दिल और दिमाग पर ऐसा गहरा असर छोड़ती है कि थिएटर से बाहर आने के बाद भी इसके किरदार कई दिनों तक आपके साथ रह जाते हैं. लेकिन क्या ये सिर्फ एक इमोशनल ड्रामा है? आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या खास है जो इसे बाकी फिल्मों से अलग खड़ा करता है? इन तमाम सवालों का जवाब जानने के लिए पढ़ें पूरा रिव्यू.
कहानी:
फिल्म की कहानी का ताना-बाना एक मां और उसके बेटे के इर्द-गिर्द बुना गया है. कहानी की शुरुआत ही एक गहरे सस्पेंस के साथ होती है. एक प्रेग्नेंट मां जुर्म की सजा काट रही है. जेल की काल कोठरी में ही उसके बच्चे का जन्म होता है. सजा पूरी होने के बाद जब ये औरत अपने मासूम बेटे के साथ बाहर की दुनिया में कदम रखती है, तो जाहिर सी बात है कि जिंदगी उनके लिए फूलों की सेज तो नहीं बिछाएगी. समाज के तीखे तीरों और अपने अतीत से बचने के लिए यह मां-बेटा लगातार अपनी पहचान बदलते रहते हैं, एक शहर से दूसरे शहर भागते रहते हैं.
भागमभाग की इसी जिंदगी के बीच, इस मां को एक गांव के इलाके में एक बुजुर्ग महिला की देखरेख करने का काम मिलता है. कुछ समय के लिए ऐसा लगता है कि आखिरकार इस भटकती हुई मां और बेटे को एक सुकून का आशियाना, एक सेफ स्पेस मिल गया है. दोनों वहां राहत की सांस लेते हैं, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. वहां कुछ ऐसा घटता है जो उन दोनों की जिंदगी को पूरी तरह से उलट-पुलट कर रख देता है. आखिर वहां क्या हुआ था और उस हादसे ने इन दोनों की जिंदगी को किस तरह से बदला? ये जानने के लिए आपको थियेटर में जाकर बालन देखनी होगी.
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कैसी है फिल्म?
एक दर्शक के तौर पर हम इस कहानी में बिल्कुल बीच से एंट्री करते हैं. शुरुआत में हम सिर्फ यह देखते हैं कि ये मां-बेटा किसी अनजान डर से लगातार भागे जा रहे हैं और हमारे अंदर यह जानने की उत्सुकता जागती है कि आखिर वो कौन सी बात है जो इन्हें एक सुरक्षित दिखने वाली जगह से भी भागने पर मजबूर कर रही है. जब हमें लगता है कि यह फिल्म सिर्फ उनके इसी सफर के बारे में होने वाली है, तभी डायरेक्टर कहानी में एक ऐसा तगड़ा झटका देते हैं कि पूरी फिल्म एक अलग ही दिशा में मुड़ जाती है. इसके बाद फिल्म पूरी तरह से एक कैरेक्टर स्टडी बन जाती है. एक पल के लिए आपको लग सकता है कि फिल्म अपनी मुख्य पटरी से उतरकर कहीं और जा रही है, लेकिन यही चिदंबरम की असली खूबी है. वो जानबूझकर हमें घुमाते हैं ताकि फिल्म का आखिरी क्लाइमेक्स दस गुना ज्यादा ताकतवर बन जाए.
इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती ये है कि यह मां-बेटे के रिश्ते को किसी घिसे-पिटे फिल्मी चश्मे से नहीं दिखाती. हमने हिंदी सिनेमा में ‘मेरे करण-अर्जुन आएंगे’ जैसी लाउड मां देखी है, या फिर हालिया फिल्मों में ऐसी मां भी देखने मिली है जो अपने बेटे के लिए तलवार उठा ले या बेटा बाप के लिए कत्लेआम मचा दे. ये फिल्म उस एक्सट्रीम लेवल से भी आगे जाती है, लेकिन बहुत ही सहजता और सादगी के साथ. यहां मां कोई फिल्मी कैरेक्टर नहीं लगती, बल्कि ऐसी लगती है जैसे हमारे-आपके पड़ोस में रहने वाली कोई आम औरत हो. ये मां भी बहुत आम है, लेकिन उसके अंदर छुपा क्रिमिनल इंस्टिंक्ट और अपने बेटे को बचाने की छटपटाहट फिल्म को एक क्राइम स्टोरी बना देती है. पुलिस का किरदार हो या गांव के लोग, डायरेक्टर ने हर एक किरदार के जरिए समाज की अलग-अलग परतों को बड़े शानदार तरीके से उकेरा है.
डायरेक्शन
चिदंबरम के निर्देशन की सबसे बड़ी जीत यह है कि वो जानते हैं कि किसी किरदार द्वारा कही गई एक बेहद साधारण सी लाइन में कितनी गहरी परतें जोड़ी जा सकती हैं. फिल्म के शुरुआती हिस्से में एक डायलॉग आता है, जिसकी अहमियत हमें उसी वक्त समझ आ जाती है. लेकिन मेकर्स इसके बाद कहानी को एक अलग ट्रैक पर ले जाते हैं, जिससे दर्शक उस बात को थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं और फिर, जब क्लाइमेक्स में वही बात एक बड़े खुलासे के रूप में वापस सामने आती है, तो थिएटर के अंदर एक ऐसा सिनेमाई यूफोरिया पैदा होता है.
चिदंबरम को डायलॉग्स से ज्यादा विजुअल्स के जरिए कहानी कहने में मजा आता है. ‘मंजुम्मेल बॉयज़’ की ही तरह उन्होंने इस फिल्म में भी एक फ्लैट आस्पेक्ट रेशियो का इस्तेमाल किया है. कैमरामैन शाइजू खालिद ने जो फ्रेम्स सेट किए हैं, खासकर वो सीन जहां लड़का खुद को बिल्कुल अकेला और बेबस पाता है, वहां पेड़ों से घिरे ऊंचे रास्ते उस लड़के के अकेलेपन और डर को पर्दे पर सजीव कर देते हैं. सुशिन श्याम का बैकग्राउंड स्कोर बहुत कम रखा गया है, लेकिन उनके इंस्ट्रूमेंट्स फिल्म के अंदर के रहस्य और बेचैनी को लगातार बनाए रखता है. फिल्म के आखिरी पलों में ‘एंगोटा’ गाने का एक अलग वर्जन सुनने को मिलता है, जिसकी एडिटिंग देखने लायक है.
एक्टिंग
चिदंबरम ने इस फिल्म के लिए बिल्कुल नए और फ्रेश चेहरों को चुना है, और चूंकि ये फिल्म किरदारों के इर्द-गिर्द बुने सस्पेंस पर आधारित है, इसलिए ये नए चेहरे दर्शकों को कहानी पर भरोसा करने में बहुत मदद करते हैं. मां के रोल में फरजाना पलाथिंगल ने लाजवाब काम किया है. उनकी आंखों में एक अजीब सी उदासी और गहरा रहस्य छिपा है. उनकी परफॉर्मेंस ऐसी है कि दर्शक उनके क्रिमिनल पास्ट को जानने के बाद भी उनसे एक हमदर्दी महसूस करने लगते हैं. बच्चे के बचपन का किरदार आदिशेषन ने निभाया है, जिसकी मासूम आंखें फिल्म के इमोशनल ग्राफ को बहुत ऊंचा ले जाती हैं.
हालांकि स्क्रीन टाइम के मामले में मोहम्मद सिनन को कम वक्त मिला है, जिन्होंने लड़के के बड़े होने का किरदार निभाया है, लेकिन मेरे हिसाब से वो इस फिल्म के सबसे बेहतरीन परफॉर्मर साबित हुए हैं. उनके किरदार में एक गजब की जिद्द और ढीटपन है, जिसे उन्होंने पूरी शिद्दत से जिया है. इसके अलावा, जिस बुजुर्ग महिला की देखरेख ये दोनों करते हैं, उस रोल में डॉली जून का काम भी अच्छा है. पुलिस के रोल में डायरेक्टर गिरीश एडी को देखना बेहद मजेदार था, और बिना किसी संवाद के भी अर्चना पद्मिनी ने अपने रोल को बहुत खास बना दिया है.
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देखें या नहीं
ये फिल्म उन लोगों के लिए बिल्कुल नहीं है जो थिएटर में ‘मंजुम्मेल बॉयज’ जैसा फास्ट-पेस्ड सर्वाइवल थ्रिलर या कोई कमर्शियल मसाला देखने की उम्मीद लेकर जा रहे हैं. इसका मिजाज बहुत शांत, धीमा और कैरेक्टर-ड्रिवेन है.
‘बालन: द बॉय’ ये साबित करती है कि चिदंबरम उन डायरेक्टर्स में से नहीं हैं जो एक बड़ी हिट देने के बाद तुरंत किसी बड़े स्टार के साथ 200 करोड़ की खोखली कमर्शियल फिल्म बनाने की रेस में दौड़ने लगें. उन्होंने स्टारडम के दबाव में न आकर एक बेहद सादगी भरी, गहरी और किरदारों से सजी कहानी पर दांव खेला. फिल्म के लेखक जिथु माधवन ने अपनी पुरानी कॉमेडी-एक्शन इमेज से बिल्कुल हटकर एक बेहद डार्क और इमोशनल कहानी लिखी है, जो सीधे दिल में उतरती है. ये फिल्म हमें याद दिलाती है कि सिनेमा सिर्फ शोर-शराबे का नाम नहीं है, बल्कि खामोशी से भी बहुत कुछ कहा जा सकता है. अगर आप एक रीयलिस्टिक और दिमाग को झकझोर देने वाला सिनेमा देखने के शौकीन हैं, तो ‘बालन: द बॉय’ को बिल्कुल भी मिस मत कीजिएगा.




